किसी भी कंपनी में क्या-क्या fundamentals होते हैं - सबको एक-एक करके समझें ।
1. Revenue :-
Revenue का सिंपल मतलब है की कोई भी कंपनी टोटल कितनी कमाई कर रही है । जैसे - एक कंपनी है जो 1 साल में 1000 लैपटॉप बेचते हैं । जिसमें प्रत्येक लैपटॉप का दाम ₹25000 है । तो उसका रेवेन्यू होगा ।
1000×25000= 25000000 ( 2 करोड़ 25 लाख )
2.Profitability :-
रेवेन्यू में जितने भी खर्च हुए हैं उन सब को घटाने के बाद जो प्रॉफिट बचता है । उसी को 'profitability' कहा जाता है । इसके 3 प्रकार हैं ।
( 1 ) gross profit:-
कंपनी में कुल बिक्री ( Revenue ) में से सिर्फ माल बनाने का खर्च ( cost of goods sold ) को घटाने के बाद जो पैसा बचता है उसे gross profit कहा जाता है । जैसे - एक कंपनी है जो साल में 10 लाख ( 1000000 ) Revenue जेनरेट कर रहा है । और 10 लाख में 5 लाख उस कंपनी को माल बनाने में लग जाता है चाहे वह प्रोडक्ट हो या फिर कोई सर्विस हो । तो उसका ग्रास प्रॉफिट होगा -
Gross profit= Revenue-cost of goods sold
Gross profit= 1000000- 500000
Gross profit= 500000 ( 5 लाख )
( 2 ) Operating profit :-
Operating Profit का मतलब है कि किसी भी कंपनी ने अपने प्रोडक्ट या सर्विस बेचकर जो कमाई की, उसमें से बिजनेस चलाने का खर्च (जैसे की सैलरी, किराया, बिजली, आदि) निकालने के बाद जो बचा, वही operating Profit है । जैसे - मान लीजिए कि गोपाल एक रेस्टोरेंट चलाता है ।
हर महीने वह एक लाख ( 100000 ) की कमाई करता है ( sales )
खाने का सामान गैस कुकिंग में 40000 खर्च होता है ।
स्टाफ की सैलरी, दुकान का किराया, बिजली बिल आदि का खर्च 30 हजार ( 30000
Gross profit= 100000-40000 = 60000
Operating profit= 6000- 30000
Operating profit= 30000
यानी की गोपाल को अपने रेस्टोरेंट से हर महीने 30000 का असली फायदा हो रहा है जिसे ऑपरेटिंग प्रॉफिट कहा जाता है ।
( 3 )net profit :-
सभी खर्चों को घटाने के बाद जो प्रॉफिट बचता है उसे नेट प्रॉफिट कहा जाता है यही कंपनी का एक्चुअल मुनाफा होता है ।
3. मार्केट शेयर :-
( यहां पर बात हो रही है "मार्केट शेयर" की "शेयर मार्केट" की नहीं । क्योंकि शेयर मार्केट अलग होता है और मार्केट शेयर अलग होता है )
मार्केट शेयर का सीधा मतलब यह है की कोई भी कंपनी अपने प्रोडक्ट या सर्विस के जरिए अपनी कैटेगरी में अपने मार्केट को कितना cover किया है । मतलब वह अपने मार्केट में कितना पर्सेंट बिक्री ( sales ) कर रहा है । जैसे की मार्केट शेयर को हम उदाहरण के तौर पर अच्छा से समझते हैं ।
मारुति सुजुकी कंपनी जो कार बेचती है इसका मार्केट शेयर 42% है, 42% मार्केट शेयर का मतलब यह है कि मारुति सुजुकी अपनी "कार इंडस्ट्रीज" के मार्केट में 42% मार्केट को cover कर रहा है । बाकी जो कार इंडस्ट्रीज में 58% मार्केट बचा है वह दूसरी कार की अलग-अलग कंपनियों कवर कर रही है जैसे- टाटा मोटर्स, हुंडई, महिंद्रा, किया, होंडा, टोयोटा जैसी कई दूसरी कंपनियाँ मिलकर कवर करती हैं ।
4. Assets :-
Assets को अगर साधारण भाषा में समझे तो Assets का मतलब यह है कि कंपनी के पास कितनी संपत्तियां है जो कंपनी की है ।
Assets के मुख्य तीन प्रकार हैं
( 1 ) Current assets:-
current assets का मतलब है की कंपनी के पास 1 साल के अंदर इस्तेमाल या नकद में बदले जा सकने वाले जो चीजें हैं उन्हीं को current assets कहा जाता है जैसे की cash ( नकद ), Bank balliance, inventory ( माल स्टोक)
( 2 ) Fixed assets:-
fixed assets का मतलब ऐसी चीज जो कंपनी के अंदर लंबे समय तक काम में आ सकते हैं जो कंपनी की है जो कभी खत्म नहीं होगा जब तक की कंपनियों उसे बेच ना दे । जैसे की जमीनें, बिल्डिंग, मशीनें, वाहन, फर्नीचर etc.
( 3 ) Intangible assets:-
intangible assets का मतलब यह है कि जिनका कोई भौतिक नहीं है जो मूल्य है जो वैल्यू है जैसे की - कंपनी का ब्रांड वैल्यू,patent, copyright, goodwill etc.
5. Liabilities :-
लायबिलिटी का सीधा मतलब है कि कंपनी के अंदर जो कर्ज है जैसे की - Creditors (सप्लायर्स से लिए गए उधार) Short-term loans,Bills Payable ,Outstanding expenses ( बकाया खर्च ),Bank loans ( लंबी अवधि के लिए )Debentures,Lease obligations
6. Cash Flow :-
cash flow का मतलब है की "कंपनी के पास एक निश्चित समय में कितना कैश आया और कितना गया ।"
7. Debt-to-Equity Ratio ( D/E Ratio ):-
Debt to Equity Ratio का सीधा मतलब होता है कि कोई भी कंपनी अपने बिजनेस को चलाने के लिए कितनी फंडिंग उधार (debt) से कर रही है और कितनी अपनी पूंजी (equity) से । Debt to equity ratio यह दिखाता है कि कंपनी ने 1 रुपये की अपनी पूंजी (equity) के मुकाबले कितना उधार (debt) लिया है ।
Debt to equity ratio को फार्मूले के आधार पर अच्छे से समझते हैं -
Debt to equity ratio= total debt/shareholder equity
( 1 ) Total Debt :-
किसी कंपनी ने अपने बिज़नेस को चलाने के लिए बैंकों या अन्य स्रोतों से जो भी उधार लिया है, वह उसका Total Debt होता है ।
इसमें दो चीजें आती हैं -
Short-Term Debt:-
जो 1 साल के अंदर चुकाना होता है (जैसे: Working capital loan)
Long-Term Debt:-
जो 1 साल से ज्यादा के लिए होता है (जैसे: Term loan, bonds)
उदाहरण -
अगर कंपनी ने 5 करोड़ का लोन बैंक से 5 साल के लिए लिया और 2 करोड़ का लोन 6 महीने के लिए, तो Total Debt = 5 + 2 = 7 करोड़
( 2 )Shareholders' Equity :-
यह कंपनी के मालिकों (यानि शेयरहोल्डर्स) की कुल हिस्सेदारी है ।
इसमें शामिल होते हैं -
Share Capital (जितना पैसा शेयर बेचकर जुटाया )
Reserves & Surplus (कंपनी की बचत या लाभ)
उधारण-
अगर कंपनी के पास 15 करोड़ की संपत्ति (assets) है और 7 करोड़ का कर्ज़ (liability) है, तो:
\text{Equity} = 15 - 7 = \text{8 करोड़}
अगर किसी कंपनी का कुल उधार 10 करोड़ है और उसकी शेयरहोल्डर्स इक्विटी 5 करोड़ है, तो -
Debt to equity ratio=10/5
Debt to equity ratio= 2
इसका मतलब है कि कंपनी ने हर 1 रुपये की अपनी पूंजी के बदले 2 रुपये उधार लिया है।
Debt to Equity Ratio से निवेशक ( investors ) यह समझते हैं कि कोई भी कंपनी जिसमें वह पैसा लग रहा है वह कंपनी कितनी फाइनेंशियल रिस्क पर काम कर रही है ।
8. Customer Base :-
कस्टमर बेस का सीधा मतलब होता है कि किसी भी कंपनी के व सभी ग्राहक जिन्होंने कंपनी से एक बार प्रोडक्ट खरीदी है या फिर बार-बार प्रोडक्ट खरीदी है मतलब कंपनी में जितने भी ग्राहक है जिन्होंने प्रोडक्ट खरीदी है फिर चाहे वह एक बार का ग्राहक हो या फिर बार-बार का ग्राहक हो- उन सब को मिला के कस्टमर बेस कहा जाता है ।
9. Brand Value :-
ब्रांड वैल्यू का सीधा मतलब है कि आपकी कंपनी जिस ब्रांड नेम से है उस brand को मार्केट में कितने लोग जानते हैं, मार्केट में उसकी कितनी वैल्यू है, आपका ब्रांड मार्केट में आर्थिक रूप से कितनी ताकतवर है । किसी भी कंपनी का ब्रांड वैल्यू मार्केट में तभी अच्छा रहेगा जब वो कंपनी मार्केट में लोगों को अच्छा प्रोडक्ट या सर्विस देगा मतलब लोगों को उस ब्रांड पर भरोसा होना चाहिए और विश्वास होना चाहिए ।
10. Employee Strength :-
employee Strength का मतलब होता है कि किसी भी कंपनी में कितने employee हैं और उन employee के अंदर अपनी कंपनी के प्रति कितने क्षमता और काबिलियत है ।
11. Innovation and R&D :-
"Innovation और R&D का मतलब है कि कंपनी में किस तरह के नए इनोवेशन हो रहे हैं, किस तरह से नए-नए विचारों और तकनीकों पर काम किया जा रहा है, और कंपनी के अंदर नए ज्ञान की खोज की जा रही है।"
12. Regulatory Compliance :-
Regulatory Compliance का मतलब होता है कि कोई भी कंपनी कानूनी नियमों मनकों और सरकारी निदेशकों का पालन अपने उद्योग क्षेत्र में कर रही या फिर नहीं कर रही ।
13. Leadership and Management :-
Leadership and Management कसीदा मतलब होता है कि किसी भी कंपनी में कंपनी का लीडरशिप मैनेजमेंट कैसा है कि अगर किसी कंपनी में कोई लीडर है तो वह किस तरह से अपने टीम को मैनेज करता है किस तरह से उन्हें मोटिवेट करता है किस तरह उन्हें नई-नई चीजों को करने के लिए इंस्पायर करता है और किस तरह वह जब कंपनी में कोई प्रॉब्लम आए तो वो उस चीज को मैनेज करता है ।
14. Competitive Advantage :-
Competitive Advantage का मतलब होता है कि किसी भी कंपनी के अंदर वह विशेषताएं जो उन्हें अपनी प्रतिस्पर्धा (कंपीटीटर) से अलग बनाती है ।
15. Growth potential :-
"Growth Potential का मतलब है कि किसी कंपनी के पास भविष्य में अपने व्यापार को बढ़ाने की कितनी क्षमता है, और वह भविष्य में किस तरह से विकास कर सकती है। यह बताता है कि कंपनी आने वाले समय में कितनी सफलता प्राप्त कर सकती है और किस दिशा में अपने व्यापार को विस्तार दे सकती है।"
Equity:-
equity का मतलब होता है कि किसी भी कंपनी का कितना पर्सेंट इक्विटी इन्वेस्टर के पास या फिर किसी दूसरे लोगों के पास है जैसे - दो बिजनेस पार्टनर का अलग-अलग equity, कंपनी के ओनर का कोई रिलेटिव या फिर कोई दोस्त नई कंपनी के लिए कुछ फंडिंग दिया है तो उसका उसे कंपनी पर कुछ इक्विटी डिपेंड करता है कि उसने कितना फंडिंग दिया है उसी हिसाब से कंपनी के अन्दर equity तय होता है । कोई भी कंपनी अपने ग्रंथ के लिए अलग-अलग इन्वेस्टर से अलग-अलग तरह का फंडिंग लेता है और वह इन्वेस्टर कंपनी से कुछ परसेंट equity लेकर उन्हें फंडिंग देता है फिर वह इन्वेस्टर को जितना परसेंट फंडिंग मिलता है इस फंडिंग के हिसाब से उन्हें कंपनी के अंदर कुछ इक्विटी दिया जाता है जिससे वह भी कंपनी के अन्दर, कुछ हिस्सेदारी का मालिक बन जाता है ।